शंकराचार्य मठ इंदौर में प्रवचन:जो स्वयं को जान लेता है, वही परमात्मा को जान सकता है- डॉ. गिरीशानंदजी महाराज
शंकराचार्य मठ इंदौर में प्रवचन:जो स्वयं को जान लेता है, वही परमात्मा को जान सकता है- डॉ. गिरीशानंदजी महाराज
विष्णु सहस्रनाम में लिखा है- अनेक रूप रूपाय विष्णवे प्रभ विष्णवे... एक ही भगवान हमारे सामने अनेक रूप लेकर आते हैं। कहीं पर आग लगी है, कहीं धार्मिक संस्कार हो रहे हैं, कहीं शोक है, कहीं पर सत्संग चल रहा है, कहीं लोग आपस में लड़ रहे हैं, ऊपर का स्वभाव तो बदलता है, क्योंकि वह सच्चा नहीं है, परंतु परम सत्य नहीं बदलता, क्योंकि वह सच्चा है। इसलिए बड़े-बड़े डाकू और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग महात्मा हो गए। संत लोग बदलते नहीं हैं। वे तो केवल बदलने वालों को देखते हैं। जो स्वयं को जान लेता है, वही परमात्मा को जान सकता है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में गुरुवार को यह बात कही। सबके अंदर तो भगवान ही हैं... महाराजश्री ने श्रीमद् भागवत गीता का श्लोक सुनाया- विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी। शुनि चैव श्वपाके च पंडिता : समदर्शिन :।।... विद्वान पुरुष विद्या, विनययुक्त ब्राह्मण, चांडाल, हाथी-गाय, कुत्ते सबमें परमात्मा देखते हैं। गीता में कहा गया है- सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ... द्वेष्य और संबंधियों में तथा साधु-आचरण करने वालों में और पाप-आचरण करने वालों में भी सम बुद्धि वाला मनुष्य श्रेष्ठ है। साधुओं और पापियों में भी सम बुद्धि वाला व्यक्ति समान रूप से भगवान को देखता है। वह मनुष्य श्रेष्ठ है, जो हमसे द्वेष-विरोध करे, हमारी निंदा-निरादर करे, उनमें भी भगवान को देखे। वह सोचता है, इनका स्वभाव कैसा भी हो पर ये भीतर से तो भगवान ही हैं। ठीक उसी तरह जैसे शेर, सांप, बिच्छू और अनेक जीव कुरूपता धारण करते हैं, पर वे हैं तो सब भगवान के तत्व ही। ऊपर से अनेक रंगों के वस्त्र पहने हुए हैं, पर अंदर से तो भगवान ही हैं। राग-द्वैष के कारण दिखते हैं पृथक-पृथक डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा- जब हम स्नान करते समय साबुन लगाकर दर्पण में देखते हैं तो हमें शरीर पर साबुन के फैस से बने कहीं फफोले तो कहीं धारियां दिखाई देती हैं। भद्दा देखने पर भी मन में दु:ख या यह डर नहीं होता कि यह कोई बीमारी तो नहीं है। क्योंकि हमारे भीतर यह भाव और भरोसा रहता है कि ऊपर से हम फिलहाल कैसे भी दिखें पर स्नान करते ही यह सब साफ हो जाएगा। इसी तरह अनेक शरीरों में पृथक-पृथक स्वभाव दिखता है, परंतु है तो ये सभी परमात्मा के ही स्वरूप। हमारे अंदर अज्ञानता के कारण हम परमात्मा के स्वरूप को नहीं देख पाते। राग-द्वैष के कारण हमेशा पृथक-पृथक दिखते हैं।
विष्णु सहस्रनाम में लिखा है- अनेक रूप रूपाय विष्णवे प्रभ विष्णवे... एक ही भगवान हमारे सामने अनेक रूप लेकर आते हैं। कहीं पर आग लगी है, कहीं धार्मिक संस्कार हो रहे हैं, कहीं शोक है, कहीं पर सत्संग चल रहा है, कहीं लोग आपस में लड़ रहे हैं, ऊपर का स्वभाव तो बदलता है, क्योंकि वह सच्चा नहीं है, परंतु परम सत्य नहीं बदलता, क्योंकि वह सच्चा है। इसलिए बड़े-बड़े डाकू और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग महात्मा हो गए। संत लोग बदलते नहीं हैं। वे तो केवल बदलने वालों को देखते हैं। जो स्वयं को जान लेता है, वही परमात्मा को जान सकता है। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में गुरुवार को यह बात कही। सबके अंदर तो भगवान ही हैं... महाराजश्री ने श्रीमद् भागवत गीता का श्लोक सुनाया- विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी। शुनि चैव श्वपाके च पंडिता : समदर्शिन :।।... विद्वान पुरुष विद्या, विनययुक्त ब्राह्मण, चांडाल, हाथी-गाय, कुत्ते सबमें परमात्मा देखते हैं। गीता में कहा गया है- सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ... द्वेष्य और संबंधियों में तथा साधु-आचरण करने वालों में और पाप-आचरण करने वालों में भी सम बुद्धि वाला मनुष्य श्रेष्ठ है। साधुओं और पापियों में भी सम बुद्धि वाला व्यक्ति समान रूप से भगवान को देखता है। वह मनुष्य श्रेष्ठ है, जो हमसे द्वेष-विरोध करे, हमारी निंदा-निरादर करे, उनमें भी भगवान को देखे। वह सोचता है, इनका स्वभाव कैसा भी हो पर ये भीतर से तो भगवान ही हैं। ठीक उसी तरह जैसे शेर, सांप, बिच्छू और अनेक जीव कुरूपता धारण करते हैं, पर वे हैं तो सब भगवान के तत्व ही। ऊपर से अनेक रंगों के वस्त्र पहने हुए हैं, पर अंदर से तो भगवान ही हैं। राग-द्वैष के कारण दिखते हैं पृथक-पृथक डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा- जब हम स्नान करते समय साबुन लगाकर दर्पण में देखते हैं तो हमें शरीर पर साबुन के फैस से बने कहीं फफोले तो कहीं धारियां दिखाई देती हैं। भद्दा देखने पर भी मन में दु:ख या यह डर नहीं होता कि यह कोई बीमारी तो नहीं है। क्योंकि हमारे भीतर यह भाव और भरोसा रहता है कि ऊपर से हम फिलहाल कैसे भी दिखें पर स्नान करते ही यह सब साफ हो जाएगा। इसी तरह अनेक शरीरों में पृथक-पृथक स्वभाव दिखता है, परंतु है तो ये सभी परमात्मा के ही स्वरूप। हमारे अंदर अज्ञानता के कारण हम परमात्मा के स्वरूप को नहीं देख पाते। राग-द्वैष के कारण हमेशा पृथक-पृथक दिखते हैं।