रानी दुर्गावती विवि के कुलगुरु की मुश्किलें बढ़ी:वर्मा के नियुक्ति पर हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान; 10 साल का टीचिंग अनुभव नहीं होने का आरोप

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में पदस्थ कुलगुरु की मुश्किलें और बढ़ गई है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन जबलपुर के जिला अध्यक्ष सचिन रजक ने कुलगुरु डॉक्टर राजेश वर्मा की नियुक्ति पर सवाल खड़े करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। जिसमें शनिवार को सुनवाई हुई। जस्टिस विवेक जैन की कोर्ट ने राज्य सरकार, उच्च शिक्षा विभाग, एमपीपीएससी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय और कुलगुरु को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई अब 4 सप्ताह बाद तय की गई है। बता दे कि डॉक्टर राजेश वर्मा की नियुक्ति को लेकर पूर्व मंत्री और विधायक लखन घनघोरिया ने भी विधानसभा में मुद्दे को उठाया था, जहां उच्च शिक्षा मंत्री जवाब नहीं दे पाए, लिहाजा मामला बाद में हाईकोर्ट पहुंच गया। नियुक्ति पर गड़बड़ी का आरोप दिसंबर 2024 में आरडीवीवी के कुलगुरु की नियुक्ति पर नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने सवाल उठाए। एनएसयूआई ने उनकी पदस्थापना को गलत बताया। लगाया कि डॉ. राजेश कुमार वर्मा कुलगुरु पद के काबिल नहीं हैं। दरअसल डॉ. राजेश कुमार वर्मा के मूल पद यानी प्राध्यापक पद पर नियुक्ति में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए एनएसयूआई ने दस्तावेज भी उच्च शिक्षा विभाग के सामने पेश किए। डॉ. वर्मा को पीएचडी 25 नवंबर 2008 को प्रदान की गई थी। इसके बाद 19 जनवरी 2009 को मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत प्राध्यापक पद पर नियुक्ति के लिए रोजगार और निर्माण में विज्ञापन जारी किया। विज्ञापन में प्राध्यापक पद (प्रथम श्रेणी) के लिए दो क्वालिफिकेशन जरूरी की गई थीं। क्या है यूजीसी का नियम? एनएसयूआई जिला अध्यक्ष सचिन रजक का कहना है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) का नियम यह कहता है कि किसी भी विश्वविद्यालय में कुलपति/कुलगुरु पद के लिए उम्मीदवार के पास प्राध्यापक/वरिष्ठ आचार्य के पद पर कम से कम दस साल का वर्क एक्सपीरियंस होना जरूरी है। जिस व्यक्ति की मूल पद पर नियुक्ति ही गलत है, उसे विश्वविद्यालय का कुलगुरु बनाना यूजीसी के नियम का उल्लंघन है। 32 प्राइवेट यूनिवर्सिटी के कुलगुरुओं की नियुक्ति नए सिरे से मध्यप्रदेश सरकार के अधीन मध्यप्रदेश प्राइवेट यूनिवर्सिटी रेगुलेटरी कमीशन (एमपीपीयूआरसी) ने बीते दिनों प्रदेश की 53 प्राइवेट यूनिवर्सिटी में से 32 के कुलगुरुओं की नियुक्ति को गलत ठहराकर निरस्त कर दिया है। एमपीपीयूआरसी ने पाया कि इन कुलगुरुओं की यूजीसी के मानक और नियम के खिलाफ की गई थी। नए सिरे से नियुक्ति करने के निर्देश दिए हैं। संबंधित अदालती मामले एनएसयूआई के जिलाध्याक्ष सचिन रजक ने बताया कि डॉ. अंकिता बोहरे बनाम मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (WP 4086/2011) के मामले में यह निर्णय लिया गया कि प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए जरूरी एजुकेशनल एक्पीरियंस पीएचडी प्राप्त करने के बाद से गिना जाएगा। इस मामले में यह भी स्पष्ट किया गया कि पीएचडी से पहले का एक्पीरियंस प्राध्यापक पद के लिए मांगे गए दस साल के टीचिंग एक्पीरियंस के रूप में काउंट नहीं होगा। ऐसे संस्थानों में प्राप्त अनुभव, जो राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं (जैसे कि कुछ निजी संस्थान) को मान्यता नहीं दी जाएगी। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में डॉ. समता जैन ने एक याचिका दाखिल की (WP 8543/2011), जिसमें उन्होंने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) द्वारा प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) के पद पर उनकी नियुक्ति के लिए एप्लिकेशन अस्वीकृत किए जाने पर चुनौती दी। डॉ. जैन ने दावा किया कि उनके पास अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट डिग्री और दस साल का टीचिंग एक्पीरियंस है। इस मामले में हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि प्रोफेसर पद के लिए जरूरी एक्पीरियंस केवल डॉक्टरेट (पीएचडी) प्राप्त करने के बाद का ही मान्य होगा। एमपीपीएससी ने आवेदन को यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि डॉ. जैन के पास दस साल का अनुभव नहीं है। प्रथम नियुक्ति नियम विपरीत याचिकाकर्ता के अधिवक्ता उत्कर्ष अग्रवाल ने सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया कि आरडीवीवी के कुलगुरु की प्रथम नियुक्ति जो कि प्रोफेसर के पद पर हुई है, वह नियम के खिलाफ है। कोर्ट में दलील दी गई कि पूर्व में संगीता बारूकर के केस में एमपीपीएससी ने ऐफीडेविट में कहा था कि प्रोफेसर में नियुक्ति के लिए पीएचडी के बाद कम से कम 10 साल टीचिंग का अनुभव होना चाहिए, जो कि इस डॉक्टर राजेश वर्मा के केस में भी नहीं है, लिहाजा याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि कुलगुरु राजेश वर्मा के पास 10 साल का अनुभव नहीं है, इसलिए उनकी नियुक्ति असंवैधानिक है। एनएसयूआई जिला अध्यक्ष सचिन रजक का कहना कुलगुरु डॉक्टर राजेश वर्मा की नियुक्ति को लेकर लगातार प्रदर्शन भी किया गया, पर सरकार और उच्च शिक्षा विभाग ने ध्यान नहीं दिया, बाद में फर्जी नियुक्ति का मामला विधानसभा में भी उठा, जहां उच्च शिक्षा मंत्री ने गलत जवाब पेश किया, बाद में मामला हाईकोर्ट में पहुंचा और राज्य सरकार, एमपीपीएससी, उच्च शिक्षा विभाग को नोटिस जारी किए गए है।

रानी दुर्गावती विवि के कुलगुरु की मुश्किलें बढ़ी:वर्मा के नियुक्ति पर हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान; 10 साल का टीचिंग अनुभव नहीं होने का आरोप
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में पदस्थ कुलगुरु की मुश्किलें और बढ़ गई है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन जबलपुर के जिला अध्यक्ष सचिन रजक ने कुलगुरु डॉक्टर राजेश वर्मा की नियुक्ति पर सवाल खड़े करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। जिसमें शनिवार को सुनवाई हुई। जस्टिस विवेक जैन की कोर्ट ने राज्य सरकार, उच्च शिक्षा विभाग, एमपीपीएससी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय और कुलगुरु को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई अब 4 सप्ताह बाद तय की गई है। बता दे कि डॉक्टर राजेश वर्मा की नियुक्ति को लेकर पूर्व मंत्री और विधायक लखन घनघोरिया ने भी विधानसभा में मुद्दे को उठाया था, जहां उच्च शिक्षा मंत्री जवाब नहीं दे पाए, लिहाजा मामला बाद में हाईकोर्ट पहुंच गया। नियुक्ति पर गड़बड़ी का आरोप दिसंबर 2024 में आरडीवीवी के कुलगुरु की नियुक्ति पर नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने सवाल उठाए। एनएसयूआई ने उनकी पदस्थापना को गलत बताया। लगाया कि डॉ. राजेश कुमार वर्मा कुलगुरु पद के काबिल नहीं हैं। दरअसल डॉ. राजेश कुमार वर्मा के मूल पद यानी प्राध्यापक पद पर नियुक्ति में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए एनएसयूआई ने दस्तावेज भी उच्च शिक्षा विभाग के सामने पेश किए। डॉ. वर्मा को पीएचडी 25 नवंबर 2008 को प्रदान की गई थी। इसके बाद 19 जनवरी 2009 को मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत प्राध्यापक पद पर नियुक्ति के लिए रोजगार और निर्माण में विज्ञापन जारी किया। विज्ञापन में प्राध्यापक पद (प्रथम श्रेणी) के लिए दो क्वालिफिकेशन जरूरी की गई थीं। क्या है यूजीसी का नियम? एनएसयूआई जिला अध्यक्ष सचिन रजक का कहना है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) का नियम यह कहता है कि किसी भी विश्वविद्यालय में कुलपति/कुलगुरु पद के लिए उम्मीदवार के पास प्राध्यापक/वरिष्ठ आचार्य के पद पर कम से कम दस साल का वर्क एक्सपीरियंस होना जरूरी है। जिस व्यक्ति की मूल पद पर नियुक्ति ही गलत है, उसे विश्वविद्यालय का कुलगुरु बनाना यूजीसी के नियम का उल्लंघन है। 32 प्राइवेट यूनिवर्सिटी के कुलगुरुओं की नियुक्ति नए सिरे से मध्यप्रदेश सरकार के अधीन मध्यप्रदेश प्राइवेट यूनिवर्सिटी रेगुलेटरी कमीशन (एमपीपीयूआरसी) ने बीते दिनों प्रदेश की 53 प्राइवेट यूनिवर्सिटी में से 32 के कुलगुरुओं की नियुक्ति को गलत ठहराकर निरस्त कर दिया है। एमपीपीयूआरसी ने पाया कि इन कुलगुरुओं की यूजीसी के मानक और नियम के खिलाफ की गई थी। नए सिरे से नियुक्ति करने के निर्देश दिए हैं। संबंधित अदालती मामले एनएसयूआई के जिलाध्याक्ष सचिन रजक ने बताया कि डॉ. अंकिता बोहरे बनाम मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (WP 4086/2011) के मामले में यह निर्णय लिया गया कि प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए जरूरी एजुकेशनल एक्पीरियंस पीएचडी प्राप्त करने के बाद से गिना जाएगा। इस मामले में यह भी स्पष्ट किया गया कि पीएचडी से पहले का एक्पीरियंस प्राध्यापक पद के लिए मांगे गए दस साल के टीचिंग एक्पीरियंस के रूप में काउंट नहीं होगा। ऐसे संस्थानों में प्राप्त अनुभव, जो राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं (जैसे कि कुछ निजी संस्थान) को मान्यता नहीं दी जाएगी। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में डॉ. समता जैन ने एक याचिका दाखिल की (WP 8543/2011), जिसमें उन्होंने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) द्वारा प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) के पद पर उनकी नियुक्ति के लिए एप्लिकेशन अस्वीकृत किए जाने पर चुनौती दी। डॉ. जैन ने दावा किया कि उनके पास अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट डिग्री और दस साल का टीचिंग एक्पीरियंस है। इस मामले में हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि प्रोफेसर पद के लिए जरूरी एक्पीरियंस केवल डॉक्टरेट (पीएचडी) प्राप्त करने के बाद का ही मान्य होगा। एमपीपीएससी ने आवेदन को यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि डॉ. जैन के पास दस साल का अनुभव नहीं है। प्रथम नियुक्ति नियम विपरीत याचिकाकर्ता के अधिवक्ता उत्कर्ष अग्रवाल ने सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया कि आरडीवीवी के कुलगुरु की प्रथम नियुक्ति जो कि प्रोफेसर के पद पर हुई है, वह नियम के खिलाफ है। कोर्ट में दलील दी गई कि पूर्व में संगीता बारूकर के केस में एमपीपीएससी ने ऐफीडेविट में कहा था कि प्रोफेसर में नियुक्ति के लिए पीएचडी के बाद कम से कम 10 साल टीचिंग का अनुभव होना चाहिए, जो कि इस डॉक्टर राजेश वर्मा के केस में भी नहीं है, लिहाजा याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि कुलगुरु राजेश वर्मा के पास 10 साल का अनुभव नहीं है, इसलिए उनकी नियुक्ति असंवैधानिक है। एनएसयूआई जिला अध्यक्ष सचिन रजक का कहना कुलगुरु डॉक्टर राजेश वर्मा की नियुक्ति को लेकर लगातार प्रदर्शन भी किया गया, पर सरकार और उच्च शिक्षा विभाग ने ध्यान नहीं दिया, बाद में फर्जी नियुक्ति का मामला विधानसभा में भी उठा, जहां उच्च शिक्षा मंत्री ने गलत जवाब पेश किया, बाद में मामला हाईकोर्ट में पहुंचा और राज्य सरकार, एमपीपीएससी, उच्च शिक्षा विभाग को नोटिस जारी किए गए है।